कालीचौड़ मंदिर: यहां की गई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती

कालीचौड़ मंदिर
कालीचौड़ मंदिर

देवभूमि के कण—कण में देवत्व होने की बात यूं ही नहीं कही जाती। अब इस स्थान को ही लीजिए, देवभूमि उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के नैनीताल जिले में हल्द्वानी के निकट खेड़ा, गौलापार से अंदर सुरम्य बेहद घने वन में स्थित अत्यंत प्राचीन कालीचौड़ मंदिर है।
यह मंदिर ऋषि—मुनियों की आराधना और तपस्या का केंद्र रहा है। माना जाता है कि कालीचौड़ मंदिर हिमालयी भू—भाग में मां काली के जितने भी प्राचीन शक्तिपीठ व मंदिर हैं, उन सभी से यह ज्यादा फलदायी है। कहते हैं कि यहां पर की गई पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती। पौराणिक समय से अनेक दंतकथाओं व किवदन्तियों को समेटे यह मंदिर लंबे समय तक गोपनीय रहा। किन्तु बाद में यह स्थान लगभग सात दशक पूर्व प्रकाश में आया।

कालीचौड़ मंदिर
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       मन्दिर के पुजारी बताते हैं कि वर्ष 1942 से पूर्व कलकत्ता में एक भक्त को इस माता ने स्वप्न में दर्शन देकर कृतार्थ किया व इस स्थान की जानकारी दी। दिव्य प्रेरणा से उक्त भक्त हल्द्वानी पहुंचकर अपने मित्र राजकुमार चूड़ीवाले को सिद्धिस्थल के बारे में बताया। दैवीय कृपा से दोनों भक्तों ने गौलापार पहुंचकर भक्तजनों के जत्थे के साथ इस स्थान को खोज निकाला। यहां पहुंचकर उन्होंने पेड़ से सटी काली की मूर्ति व शिवलिंग के दर्शन किये और यहां पर मन्दिर की स्थापना की। मन्दिर के समीप ही एक ताम्रपत्र निकला। पाली भाषा में महाकाली मन्दिर का महात्म्य का उल्लेख किया गया है।

कालीचौड़ मंदिर
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  कहा जाता है कि यहां महिषासुर मर्दिनी मां काली की आदमकद मूर्ति सहित दर्जनों मूर्तियां मंदिर के स्थान से ही धरती से निकली हैं। तराई-भाबर के गजेटियर के अनुसार लगभग आठवीं सदी में आदि गुरु शंकराचार्य अपने देवभूमि उत्तराखंड प्रवास के दौरान सर्वप्रथम इस स्थान पर आये थे। उन्हें यहाँ आध्यात्मिक ओजस्व ज्ञान प्राप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने यहाँ काफी समय तक आध्यात्मिक चिंतन किया और फिर यहां से जागेश्वर और गंगोलीहाट गए थे। बाद में कोलकाता के एक महंत की प्रेरणा पर गौलापार के जमींदार-मेहरा थोकदार ने यहाँ मंदिर बनवाया था।

कालीचौड़ मंदिर
कालीचौड़ मंदिर

     श्री रामदत्त जोशी पंचांगकार के पिता पंडित हरिदत्त जोशी ने यहां मूर्तियों की स्थापना की थी, श्री राम दत्त जोशी ने ही यहां सर्वप्रथम श्रीमद् देवी भागवत कथा का पाठ कराया था। इसके आगे की कथा भी कम रोचक नहीं है। हल्द्वानी के एक चूड़ी कारोबारी को इस स्थान से ऐसा आध्यत्मिक लगाव हुआ कि वर्षों तक उसने ही इस मंदिर की व्यवस्थाएं संभाली। इधर किच्छा के एक सिख अशोक बावा के परिवार ने अपने मृत बच्चे को यहां मां के दरबार में यह कहकर समर्पित कर दिया कि मां चाहे जो करें, अब वह मां का है। इस पर वह बच्चा फिर से जी उठा, आज करीब 30 वर्षीय वही बालक और उसका परिवार मंदिर में पिछले कई वर्षों से भंडार चलाए हुए है। इस मंदिर में दूर—दूर से श्रद्धालु दर्शन को आते हैं।

”काली—काली महाकाली कालिके परमेश्वरी,
सर्वानन्द करो देवी नारायणी नमोअस्तुते।।”
मां काली का यह पावन मंत्र वियावन वन में कालीचौड में काली भक्तों के मुखारबिंद से गुंजायमान रहता है।

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